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'जो रिजल्ट हुआ है वह बहुत अच्छा, प्रशंसनीय' : जैसा रिजल्ट हुआ है, उससे आप कितना सहमत हैं ?

गया: इंटरमीडिएट के तीनों संकायों के रिजल्ट में इस बार भारी गिरावट हुई है. साइंस, आर्ट्स व कॉमर्स तीनों को मिला कर सफलता का कुल प्रतिशत 35.24 ही रहा है. आलम है कि शहर के नामी-गिरामी स्कूलों में शामिल टी-मॉडल प्लस टू हाइ स्कूल में आट्स में फर्स्ट डिवीजन से एक भी बच्चा पास नहीं हुआ. सेकेंड डिवीजन से सिर्फ तीन व थर्ड डिवीजन से सिर्फ एक स्टूडेंट्स ही पास हो सका.

ऐसी ही स्थिति जिला स्कूल, रामरुचि बालिक प्लस टू हाइ स्कूल, मारवाड़ी हाइ स्कूल, ठाकुर मुनेश्वर नाथ हाइ स्कूल व प्लस टू हाइस्कूल पाइबिगहा आदि की है. जहां आर्ट्स विषय में भी एक भी बच्चे फर्स्ट डिविजन से पास नहीं हो सके. जिले में कई ऐसे स्कूल हैं, जहां एक भी बच्चे पास नहीं हो सके. इससे जिले के प्लस टू स्कूलों की पढ़ाई-लिखाई पर सवाल उठने शुरू हो गये हैं. इन्हीं सवालों का जवाब दे रहे हैं जिला शिक्षा पदाधिकारी (डीइओ) ठाकुर मनोरंजन प्रसाद.
 
जैसा रिजल्ट हुआ है, उससे आप कितना सहमत हैं ?
जो रिजल्ट हुआ है, वह बहुत अच्छा है. इससे लग रहा है कि सरकार, शिक्षा विभाग व बिहार विद्यालय परीक्षा समिति का क्रियाकलाप प्रशंसनीय रहा. छात्र भी समझेंगे कि अब बिना पढ़े कुछ नहीं होगा. गार्जियन भी बच्चों की पढ़ाई के प्रति सचेत रहेंगे. हालांकि, स्कूल में शिक्षकों की कमी को लेकर भी अभिभावक अपने बच्चों की पढ़ाई के प्रति चिंतित रहते थे. इस बात में कोई दो राय नहीं है कि हाइ व प्लस टू स्कूलों में शिक्षकों की जबरदस्त कमी है. शिक्षक भी पर्याप्त संख्या में नहीं हैं. खास कर गणित व साइंस के विषयाें में. साइंस के शिक्षकों की बहाली को लेकर कई चरणों में काउंसेलिंग हुई. लेकिन, शिक्षक ही नहीं मिले.
 
इस मूल्यांकन कार्य से आप कितने संतुष्ट हैं ? 
जहां तक मूल्यांकन की बात है, इस बार मूल्यांकन काफी स्वच्छ तरीके से हुआ. मूल्यांकन में कई अत्याधुनिक तकनीक अपनाये गये. कॉपियों की बार कोडिंग की गयी. लेकिन, मूल्यांकन कार्य के दौरान ही अनुभव हुआ कि कई ऐसे विषय हैं, जिनकी काॅपियों की जांच को लेकर संबंधित विषय के शिक्षक ही उपलब्ध नहीं हैं. इसके चलते मूल्यांकन काफी लंबा चला. यह बताता है कि शिक्षकों की कमी अभी भी है.
 
स्कूलों में शैक्षणिक माहौल में कैसे होगा सुधार ? 
शैक्षणिक गतिविधि के अलावा अन्य प्रकार के कार्य शिक्षक से ही सरकार कराना चाहती है, तो फिर स्कूल में शिक्षकों की संख्या बढ़ाये. क्लास लेने से अतिरिक्त शिक्षक रहेंगे तो वह शैक्षिक गतिविधि को छोड़ अन्य कार्य करेंगे. उन शिक्षकों को ड्यूटी ही दे दिया जाये कि उन्हें शैक्षणिक कार्य के छोड़ दूसरे प्रकार के कामकाज करना है. तो फिर स्कूल में नियमित रूप से क्लास चलेगा. शिक्षकों की कमी नहीं होगी. शैक्षिक कार्य से जुड़े रहनेवाले शिक्षक सिर्फ पढ़ाने का कामकाज करेंगे.
 
क्या सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया ? 
स्कूलों में पढ़ाई-लिखाई की मॉनीटरिंग को लेकर कुछ वर्ष पहले सरकार ने पैटर्न बनाया था कि स्कूलों के निरीक्षण को लेकर विशेष रूप से जिलास्तर पर अधिकारी तैनात किये जायेंगे. जिले में दो-दो आरडीडीइ व तीन-तीन डीइओ रहेंगे व सबका काम बंटा हुआ रहेगा. जिस अधिकारी के जिम्मे बैठकों में भाग लेने की जिम्मेवारी रहेगी, वे उसमें भाग लेंगे. जिन्हें स्कूलों का निरीक्षण करना होगा, वे निरीक्षण करेंगे.  उनका काम रहेगा सिर्फ स्कूलों का निरीक्षण करना व वहां की पढ़ाई-लिखाई का माहौल देखना. यह प्लानिंग ही समाप्त हो गया. कई प्रकार के पद बनाये गये थे. लेकिन, सबकुछ खत्म हो गया. यह पद संभवत: 2013 व 2014 में बनाये जाने की बात हुई थी. उस समय यह चर्चा आयी थी कि जिला स्कूल के शिक्षकों को क्लास टू वर्ग के पदाधिकारी में प्रोन्नति देकर उनकी नियुक्ति कर दी जायेगी. बहुत अच्छी योजना थी. सब अधिकारी अपनी-अपनी जिम्मेवारियों के अनुसार कामकाज करते. यह अच्छी व्यवस्था थी. लेकिन, इस योजना को लागू ही नहीं होने दिया गया. 
अब एेसे रिजल्ट के दौरान क्या होगी उनकी भूमिका ? 
अब तक उन्हें बिहार विद्यालय परीक्षा समिति द्वारा कोई ऐसी सूची उपलब्ध नहीं करायी गयी है, जिससे स्पष्ट हो सके कि उनके जिले के कितने स्टूडेंट्स फेल हुए हैं. मंगलवार की शाम कई स्कूलों के प्रधानाध्यापकों से रिजल्ट के मुद्दे पर बातचीत की थी. चार-पांच दिनों में बोर्ड से मार्क्स शीट सहित क्रॉस लिस्ट आ जायेगा. इसके बाद उसकी समीक्षा की जायेगी व बोर्ड के निर्देश के अनुसार आगे की कार्रवाई की जायेगी.
 
क्या हाइ व प्लस टू स्कूलों में प्रबंधकारिणी समिति है निष्क्रिय ?
हाइ व प्लस टू स्कूलों का सुव्यवस्थित तरीके से चलाने को लेकर शिक्षा विभाग द्वारा विद्यालय प्रबंधकारिणी समिति की गठन किया गया है. इस समिति के अध्यक्ष संबंधित विधानसभा क्षेत्र के विधायक होते हैं. लेकिन, व्यवहार में अध्यक्ष रुचि नहीं लेते हैं. यह विधायक पर ही निर्भर करता है कि वह कितनी बैठक कराते हैं और कितनी बैठकों में खुद भाग लेते हैं. मेरा तो अनुभव है कि ज्यादा तक वे अपने किसी प्रतिनिधि को विद्यालय प्रबंधकारिणी समिति की बैठक में भेज देते हैं. अपने प्रतिनिधि को ही अपने अधिकार दे देते हैं. उनके सामने कुछ बोल भी नहीं सकते हैं. यह सरकार की ही व्यवस्था है. लेकिन, अगर विधायक चाहें व स्कूल में समय से बैठक हो तो निश्चित रूप से माहौल में बदलाव होगा.
 
क्यों नहीं होती है स्कूलों की मॉनीटरिंग ?

इन दिनों वरीय अधिकारियों के साथ बैठकों की संख्या इतनी अधिक हो गयी है कि स्कूलों की मॉनीटरिंग करनेवाले जिला स्तर पर शिक्षा विभाग के अधिकारी बैठकों में भाग लेने में ही व्यस्त रहते हैं. उन्होंने डीइआे व डीपीओ की ओर इशारा करते हुए कहा कि हाइकोर्ट, लोकायुक्त, लोक सूचना का अधिकार व लोक शिकायत निवारण अधिनियम सहित कई ऐसे विभाग हैं, जहां वे दिन भर व्यस्त रहते हैं. डीइओ व डीपीओ तो सब जगह जाते-जाते तबाह रहते हैं. इन्हें समय ही नहीं मिलता है कि विद्यालय में जाकर देख सकें कि वहां क्या हो रहा है? पढ़ाई हो रही है या नहीं हो रही है? समय पर शिक्षक आ रहे हैं या नहीं आ रहे हैं? किसी प्रकार वह अपना कोरम पूरा करते हैं कि उन्हें कुछ विद्यालयों का निरीक्षण करना है. 

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