बिहार में एक बार फिर सरकारी शिक्षकों को उनके मूल कार्य से हटकर प्रशासनिक जिम्मेदारियाँ सौंपी गई हैं। जनगणना, चुनाव ड्यूटी और अन्य सरकारी कार्यों के बाद अब शिक्षकों को आवारा कुत्तों की गिनती और उनका विवरण तैयार करने का काम दिया गया है। यह मामला राज्य में शिक्षा व्यवस्था और सरकारी प्राथमिकताओं को लेकर गंभीर बहस का विषय बन गया है।
शिक्षकों को क्यों सौंपा गया नया कार्य?
नगर निकाय प्रशासन द्वारा आवारा कुत्तों की बढ़ती संख्या और कुत्तों के काटने की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए डेटा एकत्र करने का निर्णय लिया गया है। इसी के तहत स्कूलों को निर्देश दिया गया कि वे अपने क्षेत्र में मौजूद आवारा कुत्तों की संख्या, उनकी स्थिति और संभावित समाधान से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराएं।
इस कार्य के लिए स्कूलों में नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा गया, जिनमें अधिकांश स्थानों पर शिक्षक ही शामिल किए गए।
शिक्षक क्यों हैं नाराज़?
शिक्षकों का कहना है कि:
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उनका मुख्य कार्य पढ़ाना है, न कि प्रशासनिक सर्वे करना
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पहले से ही वे जनगणना, चुनाव और बीएलओ जैसे कार्यों में लगे रहते हैं
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अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ शिक्षण की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं
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मानसिक दबाव और कार्यभार लगातार बढ़ रहा है
कई शिक्षक संगठनों ने इसे शिक्षा व्यवस्था के साथ अन्याय बताया है।
शिक्षा व्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?
जब शिक्षक कक्षा के बजाय फील्ड वर्क में लगाए जाते हैं, तो इसका सीधा असर छात्रों पर पड़ता है।
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पढ़ाई बाधित होती है
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पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं हो पाता
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सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता पर सवाल उठते हैं
यह स्थिति खासकर ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अधिक गंभीर हो जाती है।
प्रशासन का पक्ष
प्रशासन का कहना है कि यह कार्य अस्थायी और सीमित समय के लिए है तथा इसका उद्देश्य सार्वजनिक सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। कुछ अधिकारियों का यह भी कहना है कि स्कूल अन्य कर्मचारियों को भी यह जिम्मेदारी सौंप सकते हैं, ताकि शिक्षण कार्य प्रभावित न हो।
बड़ा सवाल: क्या यही समाधान है?
यह पूरा मामला एक अहम सवाल खड़ा करता है —
क्या हर सरकारी समस्या का समाधान शिक्षकों को अतिरिक्त ड्यूटी देना ही है?
शिक्षा किसी भी समाज की नींव होती है। यदि शिक्षक लगातार गैर-शैक्षणिक कार्यों में उलझे रहेंगे, तो इसका दीर्घकालिक असर छात्रों और भविष्य की पीढ़ी पर पड़ेगा।
निष्कर्ष
आवारा कुत्तों की समस्या वास्तविक है और उसका समाधान ज़रूरी भी। लेकिन इसके लिए विशेष विभाग, नगर निगम कर्मचारी या अलग सर्वे टीम बनाई जानी चाहिए।
शिक्षकों को उनके मूल कार्य — शिक्षा देने — तक सीमित रखना ही समाज और देश दोनों के हित में है।