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'नयी बोतल में पुरानी शराब' की भांति है सेवाशर्त का झुनझुना

चाइनिज सेवाशर्त के वायरल मैसेज से शिक्षक खफा
◆ 'नयी बोतल में पुरानी शराब' की भांति है सेवाशर्त का झुनझुना
◆ तथाकथित रहनुमाओं की नाजायज़ करतूतों की मार झेल रहे नियोजित शिक्षक
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✍ संजय शर्मा
बेइंतहा ज़ोर जुल्म और शोषण के "अन्त" की आस जगाए यह "बसन्त" भी आखिरकार दगा दे गया। बीरबल की खिचड़ी के शक्ल में गत डेढ़ वर्षों से तैयार हो रहे नियोजित शिक्षकों की सेवाशर्तों के फ़ाइनल ड्राफ्ट का आतुरता पूर्वक बाट जोह रहे सूबे के लाखों लाख शिक्षकों को उम्मीद थी कि गत एक दशक से लम्बी अवधि से कायम जिल्लत और जलालत भरी दासतापूर्ण जिंदगी के कुचक्र से निकलने का शायद कोई बेहतर मार्ग इस बार अवश्य मिल जाएगा।
अपने हुक्मरानों या तथाकथित रहनुमाओं की नाजायज़ करतूतों की मार झेल रहे नियोजित शिक्षकों को अपने नाम के आगे लगे इस बदनुमा दाग को धोने का कोई मुक्कमल जरिया इस चिरप्रतीक्षित 'सेवाशर्त' के जरिये नसीब हो पाएगा,ऐसी सोच बलवती थी।...किन्तु प्रारम्भिक शिक्षकों की सेवाशर्त के प्रारूप सम्बन्धी प्रस्ताव का जो मसौदा आज व्हाट्सएप्प-फेसबुक पोस्ट के जरिए सामने आया है उससे बहुसंख्यक शिक्षकों की आशाओं,उम्मीदों,अपेक्षाओं और आकांक्षाओं पर एकाएक फिर से पानी फिर गया है। 'नयी बोतल में पुरानी शराब' की भांति ही "चाइनिज वेतनमान" के बाद "चाइनिज सेवाशर्त" का झुनझुना थमाकर इन शिक्षकों की आँख में धूल झोंकने की सरकारी कवायदें इससे एक बार फिर जाहिर हो गयी हैं।
देश की सर्वोच्च अदालत के बाध्यकारी न्याय निर्णयों,सांवैधानिक अवधारणाओं,अंतर्राष्ट्रीय श्रम कानूनों,लोकतांत्रिक मूल्यों और सामाजिक सरोकारों का ढीठतापूर्वक गला घोंटकर भी ख़ुद को "न्याय के साथ विकास" और "सुशासन" का झंडाबरदार कहलवाने के नशे में धुत्त एक सनकी और सिरफिरे शासक के तानाशाही रुख़ ने सूबे के शैक्षणिक बेहतरी के सोच को तो जैसे शूली पर लटका दिया है।
बहरहाल,सरकार के साथ आंखमिचौली और गलबहियां पर आमादा अपने मठाधीशी नेतृत्व की प्रताड़नापूर्ण करतूतों को भी भला कोई कैसे भूल सकता है,दो वर्ष पूर्व हक़-हकूक के निर्णायक संघर्ष के दौरान ऐतिहासिक हड़ताल के बीच एन उस वक्त जबकि बैसाखी पर चल रही सरकार एकदम से बैकफुट पर आ गयी थी..अविचल संघर्ष के प्रतीक स्वरुप 'अमृतघट' छलकने ही वाला था कि सहसा अपने ही मठाधीशी नेतृत्व के छल-छद्मपूर्ण ख़ंजर ने भीतर तक बेधकर क्रांतिकारी इतिहास का बंटाधार कर दिया। जो हड़ताल पर गये ही नहीं थे उनके हड़ताल वापसी की वारदात ने आंदोलन को जिस कदर छलनी किया उसका ख़ामियाजा अगले कितने वर्षों तक भुगतने को मेहनतकश युवा पीढ़ी अभिशप्त रहेगी–यह प्रश्न अनुत्तरित है।
अंत में..
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मौसम में कुछ फर्क नहीं है ऋतुओं में बदलाव नहीं
मधुमासों की आवभगत का कोई भी प्रस्ताव नहीं
वैसे का वैसा है पतझर वही हवा की मक्कारी
तापमान का तर्क वही है,वही घुटन है हत्यारी
बड़े मजे से नाच रहा है,फिर वो ही अंधियारा
'सूरज' अपना ही निकला है अंधा और आवारा
किरण-किरण आरोप लगाती,दिशा-दिशा है रोती
पछतावे का पार नहीं है, असफल हुई मनौती
लगता है परिवेश समूचा खुद को हार गया है
लगता है गर्भस्थ शिशु को लकवा मार गया है
पिंड न जाने कब छोड़ेगा ये दुर्भाग्य हमारा
'सूरज' अपना ही निकला है अंधा और आवारा
आधा जीवन कटा रेत में शेष कटे कीचड़ में
और पीढियां रहे भटकती नारों के बीहड़ में
दुश्चरित्र हो जाएं अगर नैया के खेवनहारे
तो गंगा हो या हो वैतरणी,प्रभु ही पार उतारे
नया फ़ैसला लेना होगा शायद हमें दुबारा
'सूरज' अपना ही निकला है अंधा और आवारा ।

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