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58 महीने से नहीं मिला इन्हें वेतन, साथ छोड़ जा रहे हैं इनके अपने

बेगूसराय। राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना के तहत बेगूसराय में कुल 56 स्कूल कार्यरत है। लेकिन स्कूल में कार्यरत शिक्षक की हालत बेहद ही खस्ता है। इन शिक्षकों को 58 महीने का मानदेय नहीं मिला है। जिसकी वजह से ये भूखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं।

मानदेय नहीं मिलने की वजह से एक शिक्षक की पत्नी और बेटी इलाज के अभाव में दम तोड़ दिया। दिव्यांग मंटुन सदा बच्चों को पढ़ाने के लिए कई किलोमीटर ट्राई साइकिल से यात्रा कर जाते हैं। सालों से बच्चों को इस उम्मीद में पढ़ाते थे कि उनके भी अच्छे दिन आयेंगे। लेकिन अच्छे दिन तो नहीं आये, बल्कि पैसों के अभाव में इनकी पत्नी और बच्ची इनका साथ छोड़कर इस दुनिया से जरूर अलविदा कर गयी। अब वो खुद बीमार पड़ गये हैं। इलाज के लिए पैसे नहीं है।

ऐसी ही एक कहानी शिक्षक मोनिका सिन्हा की भी है। जिनके पति गंभीर बीमारी से ग्रसित है। लेकिन वेतन नहीं मिलने की वजह से वो उनका इलाज नहीं करा पा रही है। जैसे-तैसे घर का खर्चा मोनिका उठा रही है।

कठिन परिस्थतियों के बीच इन शिक्षकों ने बाल श्रमिक परियोजना की सफलता के लिए जी तोड़ मेहनत की है। जिसका परिणाम है कि बेगूसराय इस परियोजना में अन्य जगहों से अव्वल है।  अधिकारी भी मानते है कि ऐसा शिक्षकों के सहयोग से ही संभव हो पाया है।

श्रम अधीक्षक मनीष कुमार कहते हैं कि राष्ट्रीय बाल श्रमिक परियोजना बेगूसराय में सबसे बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। ऐसा शिक्षकों की मेहनत का नतीजा है। लेकिन जब शिक्षक के मानदेय और मौत की घटना के बारे में पूछा जाता है तो वो सिर्फ अफसोस जाहिर कर चुप हो जाते हैं। उनका कहना है कि मानदेय 58 महीने से बंद हैं। इसके लिए हमने भारत सरकार को पत्र लिखा था। अब पैसा आ गया है। शिक्षकों को चिन्हित कर उन्हें ये रकम दे दिया जायेगा।

जिले के 280 शिक्षककर्मियों के सामने अंधेरा छाया हुआ है। लेकिन प्रशासन इससे बेखर है। शिक्षकों के मुताबिक 9 महीने पहले ही केंद्र सरकार ने मानदेय के भुगतान के लिए राशि का आवंटन जिला प्रशासन को कर दिया है। लेकिन जांच के नाम पर 9 महीने का समय बिता दिया, लेकिन अभी तक इनकी जांच पूरी नहीं हुई है।

अगर 9 महीने पहले ही अगर राशि का भुगतान कर दिया जाता तो मंटू अपनी पत्नी और बच्ची को नहीं खोता। 

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