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नितीश बाबु,ये सही है कि कफ़न में जेब नहीं होती,पर यहाँ शिक्षक वर्ग के तो जेब में ही कफ़न होता है

नितीश बाबु,ये सही है कि कफ़न में जेब नहीं होती,पर यहाँ शिक्षक वर्ग के तो जेब में ही कफ़न होता है. ना जाने कितने बार जब परिवार के आकांक्षाओं को पूरा करने अपने आप को असमर्थ पाते है तब...वही कफ़न याद आ जाता है.

एक तो आपका वेतन जब आता है तो मिडिया सहित गाजे बाजे के साथ आता है,ऊपर से बैंक कर्मी उसे अपनी बपौती समझते है. आज की ही बात है...आपका उत्तर बिहार ग्रामीण बैंक में जब मेरी पत्नी पैसे निकालने गयी तो महिला मैनेजर जबरन चार हजार कम ही निकलने दी,ऊपर से यह धौंस की आपका चेक आनेवाला है इसलिए आगे से पांच हजार बैंक में रखना पड़ेगा.एक तो शाखा का स्थान गोशाला चौक,सीतामढ़ी है किंतु बैंक है सुदूर देहात पुनोरा धाम से भी आगे.
मुझे तो लगता है बैंक को आप हम शिक्षको के वेतन से ही जिन्दा रखना चाहते है.वाकी खाताधारी तो खुद से वहां जाने से रहा।अगर यही हाल रहा तो वह महिला मैनेजर उस शाखा के कारोबार का जनाजा भी निकलवा देगी.
आज तो सच में लगने लगा क़ि वह चार हजार कफ़न हेतु ही जबरन रख लेती है.अरे भाई ,इतना महंगा कफ़न हम शिक्षकों के भाग्य में तब तक नहीं है जब तक समान काम के समान वेतन नहीं मिलता.फिलहाल अभी मेरे चार हजार निलवा दीजिये.

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