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पांचवीं सक्षमता परीक्षा का बहिष्कार: रोहतास के नियोजित शिक्षकों का बड़ा फैसला

 

बिहार में शिक्षक आंदोलन की नई कड़ी

बिहार में नियोजित शिक्षकों से जुड़ा मुद्दा एक बार फिर चर्चा में है। रोहतास जिले के सासाराम में नियोजित शिक्षकों ने पांचवीं सक्षमता परीक्षा में शामिल न होने का सामूहिक निर्णय लेकर सरकार के सामने अपनी नाराजगी जाहिर की है। यह फैसला शिक्षक नियमावली 2020 के तहत लंबित प्रोन्नति और सेवा लाभों को लेकर लिया गया है।

क्यों किया जा रहा है सक्षमता परीक्षा का बहिष्कार?

नियोजित शिक्षकों का कहना है कि सरकार उनसे सक्षमता परीक्षा देने का दबाव बना रही है, जबकि उनके मूल अधिकारों और सुविधाओं को नजरअंदाज किया जा रहा है। प्रमुख कारण इस प्रकार हैं:

  • 12 वर्षों की सेवा के बाद मिलने वाली प्रोन्नति अब तक लागू नहीं

  • स्नातक ग्रेड और प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नति में देरी

  • अन्य जिलों में नियम लागू, लेकिन रोहतास में उपेक्षा

  • शिक्षक नियमावली 2020 का पूर्ण पालन न होना

इन्हीं मांगों को लेकर शिक्षकों ने परीक्षा बहिष्कार का रास्ता चुना है।

शिक्षकों की बैठक में क्या हुआ?

सासाराम स्थित प्रखंड संसाधन केंद्र में आयोजित बैठक में बड़ी संख्या में नियोजित शिक्षक शामिल हुए। बैठक में सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि जब तक उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती, तब तक वे पांचवीं सक्षमता परीक्षा में भाग नहीं लेंगे।

बैठक के दौरान एक दिवंगत शिक्षिका की स्मृति में मौन भी रखा गया, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि शिक्षक समुदाय भावनात्मक और संगठित दोनों रूपों में एकजुट है।

सक्षमता परीक्षा का उद्देश्य क्या है?

सक्षमता परीक्षा का उद्देश्य नियोजित शिक्षकों की योग्यता का आकलन कर उन्हें सरकारी शिक्षक के समकक्ष लाना बताया जाता है। हालांकि, शिक्षकों का तर्क है कि योग्यता से पहले अधिकार और सेवा शर्तों की सुरक्षा जरूरी है

शिक्षा व्यवस्था पर क्या पड़ेगा असर?

यदि बड़ी संख्या में शिक्षक परीक्षा का बहिष्कार करते हैं, तो इसका असर:

  • सरकारी स्कूलों की पढ़ाई व्यवस्था पर

  • शिक्षक-सरकार संबंधों पर

  • भविष्य की नियुक्ति और नियमावली पर

पड़ सकता है। यह आंदोलन आगे चलकर राज्य-स्तरीय रूप भी ले सकता है।

निष्कर्ष

रोहतास के नियोजित शिक्षकों द्वारा पांचवीं सक्षमता परीक्षा का बहिष्कार केवल एक परीक्षा का विरोध नहीं है, बल्कि यह सम्मान, अधिकार और समानता की मांग है। अब देखना यह है कि सरकार इस मुद्दे पर क्या रुख अपनाती है और क्या शिक्षकों की वर्षों पुरानी मांगों का समाधान निकल पाता है।

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